Saturday, 4 November 2017

रहने दे

तेरी  ये तमन्ना, तेरा ये अरमान रहने दे
ये बेबस और लाचार भगवान रहने दे

मेरा एक ख़्वाब रोज़ दफ़न होता है, फिर ज़िंदा होता है
अब ये कब्रिस्तान वब्रिस्तान रहने दे

शराब, बर्बादी, शायरी, बदनामी, कुछ भी ना हुआ
इश्क़, और  इतना आसान? रहने दे

तेरी किस्मत के कीचड़ मे कमल एक खिल चुका
अब उस ग़ुलाब का ख़याल-ए-इम्कान रहने दे 

इतनी हिक़ारत से जो देखता है मुझको तू, जी नहीं पायेगा
मुझमे किसी खूबी का तू ख़ुदको गुमान रहने दे

किस बुलंदी पर था "तेरा आदि"  क्यूँकर हुआ बर्बाद
ज़वाल-ए-आफ़ताब की अब ये दास्तान रहने दे




- १३ आदि

Sunday, 22 October 2017

हुनर ये भी कुछ कम नही, दाना होकर नादाँ होना
महफिलों में तमाशा बनना, आसान नही है आसाँ होना

Saturday, 7 October 2017

एक एक ख़म पे एक एक शेर लिखा

एक  एक ख़म पे एक एक शेर लिखा
रात उसको मैंने बोहोत देर लिखा

अच्छा नहीं किया ...


तूने उसको मुझसे छीन कर अच्छा नहीं किया 
उसको , मुझको ग़मग़ीन कर अच्छा नहीं किया 

इरादा मैंने किया था ज़मीन आसमान एक  करने का 
तूने  अलग ज़मीन से ज़मीन कर अच्छा नहीं किया 

मै बोहोत समझाता  था उसको, मगर वो नहीं माना 
उसने तुझपे यकीन कर अच्छा नहीं किया 

अब कोई चेहरा रास नहीं आता के उसको देख लिया है 
तूने इस क़दर भी उसको हसीन कर अच्छा नहीं किया

- १३ आदि

Thursday, 5 October 2017

नही जानता...

कैसे कह दूँ के उसकी खुशबू नहीं जानता
तो क्या हुआ के उसको रूबरू नही जानता

मेरे अंदर भी कुछ ग़ज़लें बिखरी पड़ी हैं
मगर कम्बख्त मै उर्दू नहीं जानता

मै माहताब बनकर चमकूँगा उसके छत पर
वो आज मुझको जुगनू नहीं जानता

अभी इस ग़ज़ल में चंद अशार बाकी हैं
अभी मै आपको  "आप" जानता हूँ , "तू " नहीं जानता...

- १३ आदि

Wednesday, 4 October 2017

किसी काम का नहीं..

तेरी  ये तमन्ना, तेरा  ये अरमान  किसी  काम का नहीं
ये  पत्थर का भगवान किसी काम का नही

मेरा एक  ख़्वाब यहाँ रोज़ दफन होता है, फिर ज़िंदा होता है
लगता है ये कब्रिस्तान किसी काम का नही

शराब, बर्बादी, शायरी, बदनामी, कुछ भी ना हुआ
इश्क़ इतना भी आसान किसी काम का नही

तेरी किस्मत के कीचड़ मे कमल कोई खिल चुका
अब उस ग़ुलाब का ख़याल-ए-इम्कान  किसी काम का नही

जो बरसों से तेरी कमीज़ पर सजा रखा है
अब वो मेहँदी का निशान किसी काम का नही


- १३ आदि

अभी बाकी है...

तुझे आना ही होगा तेरा काम अभी बाकी है
मेरे हाथों की लकीरों में तेरा नाम अभी बाकी है

मेरा इश्क़ दीवाना कर देता है हसीनों को अक्सर
तेरी कहानी में ये मकाम अभी बाकी है

जिन वादों को करते हमने शबों से सुबहें कर दीं
जीने वो वादे तमाम अभी बाकी हैं

चौथ के रोज़ तूने रचाई थी मेहँदी, मै भी था साथ
मेरी कमीज पर वो मेहँदी का निशान अभी बाकी है

 - १३ आदि 

नहीं आया...



साहिलों पर इंतज़ार करते रहे, वो जहाज़ नहीं आया
समन्दरों  के सफर का आग़ाज़ नहीं आया

शबभर बैठकर उसने पढ़ली सारी किताब
किसी वरक़ पर मगर वो राज़ नहीं आया

हुनर मैंने सिखाया जो उसको इश्क़ का
सलीक़ा तो आया, अंदाज़ नहीं आया

वो चट्टान बनकर अड़ा रहा, न टूटा, न हिला हर्गिज़ 
मै भी "मांझी" बनकर लगा रहा बाज़ नहीं आया

बरसों से बोतल में बंद वो कीमती शराब
जब पीने का दिल किया तो हमराज़ नहीं आया

जिसको खुदा  मानकर मै देता रहा सदा
वो पढ़ रहा था नमाज़, नहीं आया

वस्ल की शब् को किसी गलफहमी पर
"जगतजननी" को लगा के "सरफ़राज़" नहीं आया...

- १३  आदि