साहिलों पर इंतज़ार करते रहे, वो जहाज़ नहीं आया
समन्दरों के सफर का आग़ाज़ नहीं आया
शबभर बैठकर उसने पढ़ली सारी किताब
किसी वरक़ पर मगर वो राज़ नहीं आया
हुनर
मैंने सिखाया जो उसको इश्क़ का
सलीक़ा
तो आया, अंदाज़ नहीं आया
वो
चट्टान बनकर अड़ा रहा, न टूटा, न हिला हर्गिज़
मै
भी "मांझी" बनकर लगा रहा बाज़ नहीं आया
बरसों से बोतल में बंद वो कीमती शराब
जब पीने का दिल किया तो हमराज़ नहीं आया
जिसको खुदा मानकर मै देता रहा सदा
वो पढ़ रहा था नमाज़, नहीं आया
वस्ल की शब् को किसी गलफहमी पर
"जगतजननी" को लगा के "सरफ़राज़" नहीं आया...
- १३ आदि